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विदेशियों को लुभा रही बस्तरिया इमली, पाकिस्तान व श्रीलंका समेत कई देशों में है जबर्दश्त मांग

 

(विशेष..)
रायपुर, 06 अगस्त (हि.स.) । छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में पैदा होने वाली इमली विदेशियों को भी लुभा रही है। यहां की इमली की मांग देश के आंध्रप्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में तो है ही, विदेशों में भी है। पाकिस्तान, श्रीलंका, मलेशिया और वियतनाम के लोग इससे बने खाद्य पदार्थ चटखारे लेकर खाते हैं।
जगदलपुर में एशिया की सबसे बड़ी इमली मंडी है। यहां से इमली दूसरे राज्यों में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी भेजी जाती है। दूसरे देशों में जा रही बस्तर की इमली विदेशियों को अपने स्वाद से काफी लुभा रही है। इसका औसतन कारोबार 1000 करोड़ रुपये के आसपास है। बस्तर की आबोहवा इमली के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद है। यही वजह है कि हर साल इमली की बंपर पैदावार व कारोबार बस्तर में होता है। बस्तर में इमली की बड़ी तादाद में पैदावार होती है, जिसके चलते यहां के व्यापारी बस्तर की इमली को दूसरे राज्यों में भेजते हैं।
बस्तरिया इमली की खासियत इसकी क्वालिटी और रंग है, जो विदेशों में अपनी पहचान बनाए हुए है। यहां की इमली की मांग आंध्रप्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में तो है ही, वहीं सालाना करीब 200 करोड़ के इमली का निर्यात श्रीलंका, मलेशिया, पाकिस्तान व वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में भी किया जाता है। हालांकि पड़ोसी देशों में जाने वाली इमली सीधे बस्तर से न होकर आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु के रास्ते वहां तक पहुंचती है। बस्तर के नारायणपुर से आने वाली इमली अपने बेहतर क्वालिटी के लिए विख्यात है तो लोंहड़ीगुड़ा की इमली अपने रंग को लेकर लोकप्रिय है। दरभा की इमली गूदेदार व मीठे स्वाद की वजह से अन्य राज्यों में भी पसंदीदा बनी हुई है।
कारोबारियों के मुताबिक बस्तर की इमली को काफी ज्यादा पंसद किया जाता है। वर्तमान में इसका थोक दाम 2800 और अधिकतम 4300 रुपये प्रति क्विंटल तक है। बस्तरिया इमली की मांग अन्य राज्यों में होने की वजह से स्थानीय व्यापारियों को इसकी कीमत अच्छी मिलने लगी है। वहीं, दूसरे राज्यों के व्यापारी भी यहां आकर इमली खरीदने में काफी रुचि दिखा रहे हैं। 
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा लघु वनोपजों का समर्थन मूल्य निर्धारित करने के लिए लगातार किए जा रहे प्रयासों के फलस्वरूप भारत सरकार ने इमली का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित कर दिया है। यह न्यूनतम समर्थन मूल्य 2200 रुपये प्रति क्विंटल यानी 22 रुपये प्रति किलो निर्धारित है लेकिन इमली की मांग ऐसी है कि कई बार वनवासियों-व्यापारियों को समर्थन मूल्य से अधिक कीमत पर भी इमली बेच लेते हैं।
बस्तर क्षेत्र में इमली का बंपर उत्पादन होने के कारण अब इमली से संबंधित विभिन्न प्रसंस्करण इकाइयां भी लगाई जा रही हैं। इमली के बीज और रेशे निकालकर चपाती बनाने का काम भी शुरू हो चुका है। यह कार्य मशीनों के जरिये किया जा रहा है। इससे महिलाओं का समय बचने के अलावा उन्हें मुनाफा भी अधिक मिल रहा है। कृषि विभाग द्वारा इमली के बीज और रेशे को निकालकर चपाती बनाने का प्रशिक्षण ट्राइफेड के माध्यम से दिया जा रहा है। 
ट्राइफेड के क्षेत्रीय प्रबंधक पीके पंडा के मुताबिक 300 आदिवासी महिला समूहों को इमली चपाती बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। प्रशिक्षण लेने के बाद महिलाओं ने इमली से जो भी उत्पाद बनाए इसकी मांग स्थानीय स्तर के साथ बाहर भी है। इसके अलावा बस्तर की इमली से बनाई जा रही खट्टी-मीठी कैंडी तेजी से लोकप्रिय हो रही है, साथ ही ग्रामीणों को स्वरोजगार का एक अच्छा जरिया भी दे रही है।