वाराणसी : दीपावली की रोशनी के लिए दिन-रात मेहनत कर रहीं कुम्हार महिलाएं
फुलवरिया की कोहार बस्ती में गूंज रही चाक की आवाज
वाराणसी, 04 नवंबर (हि.स.)। दीपावली का पर्व नजदीक आते ही उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी के सनातनी घरों और बाजारों में त्योहार की रौनक बढ़ने लगी है। वहीं, लोगों के घर-आंगन को रोशन करने के लिए वाराणसी के कैंट क्षेत्र स्थित फुलवरिया की कोहार (प्रजापति) बस्ती में कुम्हार परिवार दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। बस्ती में चाक की घूमती धुरी और मिट्टी को आकार देते हाथों की थाप के बीच दीपावली की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। खास बात यह है कि इस पारंपरिक हुनर को सहेजने में महिलाएं भी अहम भूमिका निभा रही हैं।
बस्ती की रहने वाली रेणु देवी अपने परिवार के साथ पीढ़ियों से चली आ रही मिट्टी के बर्तन बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। उनके हाथों से तैयार होने वाले मिट्टी के दीये, गगरी, पुरवा, हड़िया, ढकनी, परई और भड़ैया जैसे पारंपरिक बर्तन आज भी लोगों की आस्था, संस्कृति और ग्रामीण जीवनशैली का हिस्सा हैं। दीपावली के मद्देनजर इन दिनों उनका पूरा परिवार दीये और पूजन सामग्री तैयार करने में जुटा हुआ है।
रेणु देवी बताती हैं कि दीपावली के लिए दीये बनाने की तैयारी कई महीने पहले ही शुरू हो जाती है। सबसे पहले मिट्टी का इंतजाम किया जाता है। इसके बाद मिट्टी को कूटकर और गूंथकर चाक पर चढ़ाया जाता है, जहां कुशल हाथ उसे अलग-अलग आकार देते हैं। चाक पर तैयार होने के बाद कच्चे दीयों को धूप में सुखाया जाता है और फिर भट्ठी में पकाकर बिक्री के लिए तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में काफी मेहनत, समय और धैर्य की जरूरत होती है। यही वजह है कि कुम्हार परिवार दीपावली से करीब चार से पांच महीने पहले ही तैयारियों में जुट जाते हैं, ताकि त्योहार के समय बाजार की मांग पूरी की जा सके।
हालांकि, बदलते समय के साथ मिट्टी के बर्तन बनाने के इस पारंपरिक कारोबार के सामने कई चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। आधुनिकता और रोजगार के बदलते अवसरों के बीच युवा पीढ़ी का रुझान इस पुश्तैनी पेशे से कम हो रहा है। अधिकांश युवा उच्च शिक्षा हासिल कर सरकारी नौकरी और दूसरे व्यवसायों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। ऐसे में पीढ़ियों से चली आ रही यह पारंपरिक कला धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।
इसके बावजूद रेणु देवी जैसी महिलाएं अपनी मेहनत, हुनर और लगन से इस विरासत को बचाए रखने में जुटी हैं। मिट्टी को आकार देकर दीपक बनाने वाले इन्हीं कारीगरों के श्रम से दीपावली की रात लाखों घर रोशन होते हैं। त्योहार की चमक के पीछे इन परिवारों की मेहनत और संघर्ष की भी एक कहानी छिपी है। ऐसे में दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदना केवल परंपरा और संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम नहीं, बल्कि उन कारीगर परिवारों की आजीविका को सहारा देने और उनके पारंपरिक हुनर को सम्मान देने की एक छोटी-सी पहल भी है।