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विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं पर हमला कर रहा: किरेन रिजिजू


नई दिल्ली, 10 मार्च (हि.स.)। लोकसभा में मंगलवार को अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए तीखा पलटवार किया। उन्होंने स्पीकर की निष्पक्षता तथा उनके कार्यकाल में संसद की कार्यक्षमता की प्रशंसा की। अविश्वास प्रस्ताव को उन्होंने महज एक व्यक्ति की जिद करार देते हुए कहा कि विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं पर हमला कर रहा है।

बहस की शुरुआत में कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे सदन की कार्यवाही को पक्षपातपूर्ण तरीके से संचालित कर रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने का मौका न दिए जाने का जिक्र किया। गोगोई ने एक पुरानी घटना का हवाला दिया, जिसमें स्पीकर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने से रोका था, यह दावा करते हुए कि कुछ महिला सांसद प्रधानमंत्री की कुर्सी को घेरकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा करने की योजना बना रही थीं। गोगोई ने इसे शर्मनाक करार दिया और कहा कि स्पीकर का यह फैसला सदन की गरिमा के खिलाफ है।

इसके जवाब में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी से सवाल किया कि क्या वे लोकसभा प्रोटोकॉल से ऊपर हैं? सदन में सभी सदस्य समान हैं और बोलने के लिए अध्यक्ष की अनुमति अनिवार्य है। रिजिजू ने राहुल गांधी के उस बयान का जिक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि सदन में बोलने के लिए किसी के परमिशन की जरूरत नहीं है। रिजिजू ने इसे असंसदीय बताते हुए कहा कि मंत्री होने से माइक्रोफोन खुद-ब-खुद ऑन नहीं हो जाता। स्पीकर का निर्णय अंतिम होता है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 122 का हवाला दिया, जिसके तहत स्पीकर के निर्णय को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, सिवाय अनुसूची 10 के तहत सदस्यता रद्द करने के मामलों के। रिजिजू ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पीकर के फैसलों को अंतिम माना है।

इसके बाद रिजिजू ने गौरव गोगोई पर भी निशाना साधते हुए कहा कि गोगोई को संसदीय कार्य मंत्रालय के कामकाज की जानकारी नहीं है क्योंकि कांग्रेस पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर रही है। उन्होंने 1954 में जीवी मावलंकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर पंडित जवाहरलाल नेहरू के भाषण का जिक्र किया, जिसमें नेहरू ने प्रस्ताव को 'बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग' और 'सदन की गरिमा के खिलाफ' बताया था। इसी तरह, 1987 में बलराम जाखर के खिलाफ प्रस्ताव पर राजीव गांधी के बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि स्पीकर पर उंगली उठाना संसदीय लोकतंत्र की नींव हिलाना है। रिजिजू ने कहा कि विपक्ष आज वही कर रहा है जो उसके पुराने नेता कभी नहीं करते थे।

रिजिजू ने ओम बिरला का कामकाज गिनवाते हुए कहा कि 17वीं लोकसभा में प्रोडक्टिविटी 97 फीसदी रही, जबकि 18वीं लोकसभा में 93.33 फीसदी। शून्यकाल में 1835 मुद्दे उठाए गए, जिनमें से 56 फीसदी विपक्ष को दिए गए। रूल 377 के तहत सदस्यों को सबसे अधिक अवसर मिले। सप्लिमेंट्री प्रश्नों में विपक्ष को 364 और सरकार को 321 मौके मिले। बिरला ने संसद को पेपरलेस बनाया, ई-नोटिस, ई-बुलेटिन, ई-रिपोर्ट्स और सदस्य पोर्टल शुरू किए। भाषण तुरंत सोशल मीडिया के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। ओम बिरला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संसद की छवि मजबूत की, 64 देशों के साथ फ्रेंडशिप ग्रुप बनाए।

बहस के दौरान टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने रूल बुक उठाकर आपत्ति जताई। उन्होंने रूल 203 का हवाला दिया कि कोई सदस्य 15 मिनट से अधिक नहीं बोल सकता। रिजिजू ने जवाब दिया कि 1954 में नेहरू ने डेढ़ घंटे बोलकर बहस शुरू की थी, जबकि आज दो दिनों की बहस निर्धारित है। पीठासीन अधिकारी कृष्णा प्रसाद तेन्नेटी ने रिजिजू को बोलने की अनुमति दी।

रिजिजू ने विपक्ष पर सदन की गरिमा भंग करने के आरोप लगाते हुए कहा कि एनडीए सदस्यों ने कभी कागज फाड़कर स्पीकर की कुर्सी पर नहीं फेंके, न टेबल पर चढ़कर नाचा। उन्होंने राहुल गांधी पर प्रधानमंत्री को गले लगाने दौड़ना और सदस्यों की ओर आंख मारना जैसे व्यवहार को असंसदीय बताया। रिजिजू ने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव एक व्यक्ति की जिद है और विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं पर हमला कर रहा है। कई विपक्षी सांसद निजी तौर पर प्रस्ताव से असहमत हैं लेकिन पार्टी दबाव में हैं।

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