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गोबर के दीपकों से रोशन होगी देश-विदेश की दीपावली



गोबर के दीपकों से रोशन होगी देश-विदेश की दीपावली

जयपुर, 01 नवंबर (हि.स.)। दीपावली पर घर-आंगन रोशन करने के साथ गोसेवा, महिला आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी फैल रहा है। गाय के गोबर से तैयार हो रहे पर्यावरण अनुकूल दीपक अब देश की सीमाएं पार कर विदेशों तक अपनी पहचान बना चुके हैं। जयपुर के सांगानेर स्थित श्री पिंजरापोल गोशाला के सनराइज ऑर्गेनिक पार्क में पिछले छह माह में 17 लाख से अधिक दीपकों का उत्पादन और विक्रय किया जा चुका है। इनमें से करीब 10 लाख दीपक मॉरीशस भेजे गए हैं, जबकि देश के 17 राज्यों में लगभग सात लाख दीपकों की आपूर्ति की गई है। वर्तमान में यहां प्रतिदिन करीब 10 हजार दीपक तैयार किए जा रहे हैं।

इस पहल की खास बात यह है कि दीपकों के निर्माण से लेकर उनकी गुणवत्ता जांच और पैकेजिंग तक की जिम्मेदारी महिलाओं को सौंपी गई है। टोंक, निवाई, बस्सी, मालपुरा, भरतपुर और जयपुर के 10 स्वयं सहायता समूहों की 100 से अधिक महिलाएं इस काम से जुड़ी हैं।

अखिल भारतीय गोशाला सहयोग परिषद की अंतरराष्ट्रीय सह-संयोजक एवं हैनीमैन चैरिटेबल मिशन सोसाइटी की सचिव मोनिका गुप्ता के अनुसार इसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देने के साथ उन्हें भविष्य में उद्यमी के रूप में विकसित करना है। गोबर आधारित कुटीर उद्योगों के माध्यम से महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए आजीविका के स्थायी अवसर तैयार किए जा रहे हैं।

आम परिवारों के बजट को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग आकार और डिजाइन के दीपक तैयार किए गए हैं। इनकी कीमत पांच, 10, 15, 25 और 30 रुपए रखी गई है। विशेष निर्माण प्रक्रिया के कारण इनमें तेल रिसने और दीपक के पात्र के जलने जैसी समस्याएं नहीं आतीं। परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता के अनुसार, इन स्वदेशी उत्पादों की मांग उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, केरल, कर्नाटक, गुजरात सहित देश के 17 राज्यों में है। मॉरीशस तक इनकी आपूर्ति होना स्थानीय स्तर पर तैयार उत्पादों की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।

गोबर का उपयोग अब केवल खाद और कृषि कार्यों तक सीमित नहीं है। इससे धूपबत्ती, गमले, गोमाता की मूर्तियां, गणेश-लक्ष्मी, आदियोगी, शुभ-लाभ, ओम, श्री, ब्रेसलेट और मालाएं सहित कई सजावटी व उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। प्राकृतिक सामग्री से बने इन उत्पादों को बढ़ावा मिलने से प्लास्टिक आधारित सजावटी वस्तुओं पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है। उपयोग के बाद दीपकों के अवशेषों को भी उचित तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है। बाती, तेल और अन्य अनुपयुक्त सामग्री अलग करने के बाद कंपोस्टिंग योग्य अवशेषों को निर्धारित प्रक्रिया से जैविक खाद में बदला जा सकता है।

अखिल भारतीय गोशाला सहयोग परिषद से जुड़ी देशभर की करीब चार हजार गोशालाओं को इस मॉडल से जोड़ने की योजना है। डॉ. अतुल गुप्ता के अनुसार, गोशालाओं को केवल गोवंश के आश्रय स्थल तक सीमित रखने के बजाय उन्हें ग्रामीण उद्योग, महिला रोजगार और कौशल विकास के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। गोबर आधारित उत्पादों के निर्माण, प्रशिक्षण और विपणन से गोशालाओं की आय बढ़ाने के साथ उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

जयपुर और आसपास की अन्य गोशालाओं में भी इस दिशा में काम हो रहा है। कालवाड़, रामपुरा और जोबनेर की गोशालाओं में गोबर से दीपक और सजावटी सामग्री तैयार की जा रही है। कालवाड़ स्थित गोशाला में दीपकों के साथ लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और शुभ-लाभ भी बनाए गए हैं। गोशाला से जुड़े गिरिजाशंकर मिश्र के अनुसार, इससे स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा मिलने के साथ गोशालाओं की आय में वृद्धि होगी।

बगरू के रामपुरा स्थित गोशाला में 200 से अधिक महिलाएं गोमय दीपक बनाने के काम से जुड़ी हैं। विष्णु अग्रवाल के अनुसार, विशेष तकनीक से तैयार दीपकों में तेल रिसने और जलने की समस्या नहीं आती। यहां बेंगलुरु और वृंदावन के मंदिरों से भी मांग मिली है।

गायत्री मंत्र के जाप के साथ बन रहे ऊर्जा दीपक

मथुरावाला स्थित चेतना ग्राम संस्थान में भी गोबर से ऊर्जा दीपक तैयार किए जा रहे हैं। संस्थान की संस्थापक विभा अग्रवाल के अनुसार, यहां 50 से अधिक महिलाएं इस काम में जुटी हैं। संस्थान का दावा है कि दीपकों का निर्माण गायत्री मंत्र के जाप के साथ किया जाता है। इनमें प्राकृतिक और औषधीय सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे जलने पर सुगंध भी आती है। कुछ दीपकों में औषधीय बीजों का भी उपयोग किया जा रहा है।

इस तरह गोबर से तैयार दीपक केवल दीपावली की सजावट का साधन नहीं, बल्कि गोशालाओं की आय बढ़ाने, महिलाओं को रोजगार देने और स्थानीय संसाधनों से ग्रामीण उद्योग विकसित करने का माध्यम बन रहे हैं।

गोबर के दीपकों से रोशन होगी देश-विदेश की दीपावली

जयपुर, 01 नवंबर (हि.स.)। दीपावली पर घर-आंगन रोशन करने के साथ गोसेवा, महिला आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी फैल रहा है। गाय के गोबर से तैयार हो रहे पर्यावरण अनुकूल दीपक अब देश की सीमाएं पार कर विदेशों तक अपनी पहचान बना चुके हैं। जयपुर के सांगानेर स्थित श्री पिंजरापोल गोशाला के सनराइज ऑर्गेनिक पार्क में पिछले छह माह में 17 लाख से अधिक दीपकों का उत्पादन और विक्रय किया जा चुका है। इनमें से करीब 10 लाख दीपक मॉरीशस भेजे गए हैं, जबकि देश के 17 राज्यों में लगभग सात लाख दीपकों की आपूर्ति की गई है। वर्तमान में यहां प्रतिदिन करीब 10 हजार दीपक तैयार किए जा रहे हैं।

इस पहल की खास बात यह है कि दीपकों के निर्माण से लेकर उनकी गुणवत्ता जांच और पैकेजिंग तक की जिम्मेदारी महिलाओं को सौंपी गई है। टोंक, निवाई, बस्सी, मालपुरा, भरतपुर और जयपुर के 10 स्वयं सहायता समूहों की 100 से अधिक महिलाएं इस काम से जुड़ी हैं।

अखिल भारतीय गोशाला सहयोग परिषद की अंतरराष्ट्रीय सह-संयोजक एवं हैनीमैन चैरिटेबल मिशन सोसाइटी की सचिव मोनिका गुप्ता के अनुसार इसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देने के साथ उन्हें भविष्य में उद्यमी के रूप में विकसित करना है। गोबर आधारित कुटीर उद्योगों के माध्यम से महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए आजीविका के स्थायी अवसर तैयार किए जा रहे हैं।

आम परिवारों के बजट को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग आकार और डिजाइन के दीपक तैयार किए गए हैं। इनकी कीमत पांच, 10, 15, 25 और 30 रुपए रखी गई है। विशेष निर्माण प्रक्रिया के कारण इनमें तेल रिसने और दीपक के पात्र के जलने जैसी समस्याएं नहीं आतीं। परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता के अनुसार, इन स्वदेशी उत्पादों की मांग उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, केरल, कर्नाटक, गुजरात सहित देश के 17 राज्यों में है। मॉरीशस तक इनकी आपूर्ति होना स्थानीय स्तर पर तैयार उत्पादों की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।

गोबर का उपयोग अब केवल खाद और कृषि कार्यों तक सीमित नहीं है। इससे धूपबत्ती, गमले, गोमाता की मूर्तियां, गणेश-लक्ष्मी, आदियोगी, शुभ-लाभ, ओम, श्री, ब्रेसलेट और मालाएं सहित कई सजावटी व उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। प्राकृतिक सामग्री से बने इन उत्पादों को बढ़ावा मिलने से प्लास्टिक आधारित सजावटी वस्तुओं पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है। उपयोग के बाद दीपकों के अवशेषों को भी उचित तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है। बाती, तेल और अन्य अनुपयुक्त सामग्री अलग करने के बाद कंपोस्टिंग योग्य अवशेषों को निर्धारित प्रक्रिया से जैविक खाद में बदला जा सकता है।

अखिल भारतीय गोशाला सहयोग परिषद से जुड़ी देशभर की करीब चार हजार गोशालाओं को इस मॉडल से जोड़ने की योजना है। डॉ. अतुल गुप्ता के अनुसार, गोशालाओं को केवल गोवंश के आश्रय स्थल तक सीमित रखने के बजाय उन्हें ग्रामीण उद्योग, महिला रोजगार और कौशल विकास के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। गोबर आधारित उत्पादों के निर्माण, प्रशिक्षण और विपणन से गोशालाओं की आय बढ़ाने के साथ उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

जयपुर और आसपास की अन्य गोशालाओं में भी इस दिशा में काम हो रहा है। कालवाड़, रामपुरा और जोबनेर की गोशालाओं में गोबर से दीपक और सजावटी सामग्री तैयार की जा रही है। कालवाड़ स्थित गोशाला में दीपकों के साथ लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और शुभ-लाभ भी बनाए गए हैं। गोशाला से जुड़े गिरिजाशंकर मिश्र के अनुसार, इससे स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा मिलने के साथ गोशालाओं की आय में वृद्धि होगी।

बगरू के रामपुरा स्थित गोशाला में 200 से अधिक महिलाएं गोमय दीपक बनाने के काम से जुड़ी हैं। विष्णु अग्रवाल के अनुसार, विशेष तकनीक से तैयार दीपकों में तेल रिसने और जलने की समस्या नहीं आती। यहां बेंगलुरु और वृंदावन के मंदिरों से भी मांग मिली है।

गायत्री मंत्र के जाप के साथ बन रहे ऊर्जा दीपक

मथुरावाला स्थित चेतना ग्राम संस्थान में भी गोबर से ऊर्जा दीपक तैयार किए जा रहे हैं। संस्थान की संस्थापक विभा अग्रवाल के अनुसार, यहां 50 से अधिक महिलाएं इस काम में जुटी हैं। संस्थान का दावा है कि दीपकों का निर्माण गायत्री मंत्र के जाप के साथ किया जाता है। इनमें प्राकृतिक और औषधीय सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे जलने पर सुगंध भी आती है। कुछ दीपकों में औषधीय बीजों का भी उपयोग किया जा रहा है।

इस तरह गोबर से तैयार दीपक केवल दीपावली की सजावट का साधन नहीं, बल्कि गोशालाओं की आय बढ़ाने, महिलाओं को रोजगार देने और स्थानीय संसाधनों से ग्रामीण उद्योग विकसित करने का माध्यम बन रहे हैं।

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