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मूवी रिव्यू: मनोरंजन के साथ खाद्य सुरक्षा पर सोचने को मजबूर करती 'द इंडिया स्टोरी'

फिल्म: 'द इंडिया स्टोरी'

कलाकार: श्रेयस तलपड़े, काजल अग्रवाल, मुरली शर्मा, मनीष वाधवा, त्रिशा सारदा, अतुल तिवारी, कमलेश सावंत, शाम मशालकर

निर्देशक: चेतन डीके

निर्माता: सागर शिंदे

रिलीज़: 24 जुलाई 2026

रेटिंग: ⭐⭐⭐½ (3.5/5)

सिनेमा जब मनोरंजन के साथ किसी गंभीर सामाजिक मुद्दे को उठाता है तो उसका असर लंबे समय तक दर्शकों के मन में बना रहता है। 'द इंडिया स्टोरी' ऐसी ही एक फिल्म है, जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े एक अहम विषय, खाद्य सुरक्षा और जहरीले पेस्टिसाइड्स पर सवाल खड़े करती है। निर्देशक चेतन डीके ने इस संवेदनशील मुद्दे को एक भावुक पिता की कहानी और कोर्टरूम ड्रामा के जरिए प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा है। फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, बल्कि दर्शकों को यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि हमारी थाली में परोसा जाने वाला भोजन कितना सुरक्षित है।

कहानी

फिल्म की कहानी योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) से शुरू होती है, जिसकी सात साल की बेटी कैंसर की वजह से दुनिया छोड़ देती है। जांच में सामने आता है कि लंबे समय तक जहरीले रसायनों और पेस्टिसाइड्स वाले खाद्य पदार्थों का सेवन उसकी बीमारी की एक बड़ी वजह था। अपनी बेटी को खोने के बाद योगेश हार नहीं मानता। वह इस पूरे सिस्टम के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाता है। उसके साथ खड़ी होती हैं तेज-तर्रार वकील अर्चना (काजल अग्रवाल), जो अदालत में सरकार, पेस्टिसाइड बनाने वाली कंपनियों और जिम्मेदार संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करती हैं। कोर्ट में होने वाली बहस के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं। फिल्म का पहला भाग काफी मजबूत है और इंटरवल से पहले आने वाला खुलासा कहानी में रोमांच और भावनात्मक गहराई दोनों जोड़ देता है। दूसरा भाग थोड़ा धीमा जरूर पड़ता है लेकिन अपने उद्देश्य से भटकता नहीं और एक प्रभावी संदेश के साथ खत्म होता है।

निर्देशन

निर्देशक चेतन डीके ने एक कठिन और गंभीर विषय को सरल भाषा में दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है। उन्होंने फिल्म को उपदेशात्मक बनाने के बजाय भावनात्मक कहानी के साथ जोड़ा है, जिससे दर्शक आसानी से किरदारों के साथ जुड़ जाते हैं। कोर्टरूम के दृश्य अच्छी तरह लिखे गए हैं और कहानी में लगातार दिलचस्पी बनाए रखते हैं। फिल्म की रिसर्च भी मजबूत नजर आती है और कई तथ्य सोचने पर मजबूर करते हैं।

अभिनय

श्रेयस तलपड़े ने एक दुखी लेकिन हार न मानने वाले पिता के किरदार में शानदार अभिनय किया है। उनकी भावनाएं और संघर्ष बेहद वास्तविक लगते हैं। काजल अग्रवाल आत्मविश्वासी वकील के रूप में प्रभाव छोड़ती हैं। कोर्टरूम में उनकी संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म की बड़ी ताकत है। मुरली शर्मा अपने अनुभव से कहानी को मजबूती देते हैं, जबकि मनीष वाधवा विरोधी पक्ष के वकील के रूप में प्रभावशाली नजर आते हैं। छोटी बच्ची के किरदार में त्रिशा सारदा भावनात्मक दृश्यों में दिल छू जाती हैं। अन्य कलाकार भी अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय करते हैं।

तकनीकी पक्ष

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कहानी के गंभीर माहौल के अनुरूप है। बैकग्राउंड स्कोर भावनात्मक और कोर्टरूम दृश्यों का प्रभाव बढ़ाता है। संपादन पहले भाग में कसा हुआ है, हालांकि दूसरे भाग में थोड़ी और रफ्तार होती तो फिल्म और प्रभावशाली बन सकती थी।

फाइनल वर्डिक्ट

'द इंडिया स्टोरी' सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा नहीं बल्कि हमारे समय के एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर बनी जागरूक करने वाली फिल्म है। यह मनोरंजन के साथ यह सवाल भी उठाती है कि क्या हमारी थाली में पहुंचने वाला भोजन वास्तव में सुरक्षित है।

दमदार अभिनय, मजबूत विषय और प्रभावशाली निर्देशन के दम पर यह फिल्म दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है। यदि आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो मनोरंजन के साथ समाज से जुड़े गंभीर मुद्दों पर सोचने के लिए मजबूर करें, तो 'द इंडिया स्टोरी' आपके लिए एक अच्छी पसंद साबित हो सकती है।

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