जगदलपुर, 02 सितम्बर (हि.स.)। पचहत्तर दिवसीय विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की मुख्य रस्मों में एक डेरी गड़ाई की रस्म चार सितम्बर को सिरहासार भवन में निभाई परम्परानुसार जाएगी। बिरिंगपाल से लाई गई सरगी की लकड़ी को लाई, चना, मोंगरी मछली व अंडा चढ़ाकर प्रतिस्थापित किया जा चुका है। बस्तर दशहरा पर्व के तहत पाट जात्रा के बाद डेरी गड़ाई दूसरी रस्म है। इसके बाद रथ के लिए लकड़ी लाने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। 20 सितंबर से बस्तर दशहरा पर्व को आगे बढ़ाने के लिए काछनगादी पूजा की जाएगी। इसके बाद देवी की भक्ति का पर्व बस्तर दशहरा की सात अक्टूबर तक धूम रहेगी। इसमें कुल 21 रस्में निभाई जाएगी। बस्तर दशहरा देखने के लिए विदेशों से भी लोग यहां आते हैं।

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बस्तर का 525 वर्ष पुराना बस्तर दशहरा कई मायनों में परम्परागत दशहरे से भिन्न है। यहां का दशहरा कुछ अलग ही अंदाज से मनाया जाता है। इस दशहरे में आस्था और विश्वास की डोर थामे आदिम जनजातियां अपने आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के छत्र को सैकड़ों वर्षों से विशालकाय लकड़ी से निर्मित रथ में विराजमान कर रथ को पूरे शहर के परिक्रमा के रूप में खींचती है। भूतपूर्व चित्रकोट रियासत से लेकर बस्तर रियासत तक के राजकीय चालुक्य राजपरिवार की की ईष्ट देवी और बस्तर अंचल के समस्त लोकजीवन की अधिशष्ठात्री देवी मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धाभक्ति की सामूहिक अभिव्यक्ति का पर्व बस्तर दशहरा है, यहां पर रावण का वध दशहरे की परम्परा में शामिल नहीं है।

उल्लेखनीय है कि विश्वविख्यात बस्तर दशहरे के रथ के निर्माण की जवाबदारी वर्षो से बेड़ाउमरगांव एवं झारउमरगांव के बढ़इयों द्वारा संपन्न कराई जाती है। बस्तर दशहरे के लिए निर्माण किया गया फूल रथ, चार चक्कों का तथा विजय रथ आठ चक्कों का बनाया जाता है। इस वर्ष आठ चक्कों वाला रथ का निर्माण शुरू किया जा रहा है।

दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी कृष्णकुमार ने बताया कि परंपरा के अनुसार बिरिंगपाल से लाई गई सरई पेड़ की टहनियों को विशेष स्थान पर स्थापित किया जाता है। विधि विधान से पूजा अर्चना कर माई दंतेश्वरी से आज्ञा ली जाती है। इस मौके पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों समेत लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहेंगे। डेरी गड़ाई की रस्म के बाद दशहरा रथ के निर्माण के लिए लकड़ियों को लाने की भी शुरुआत होती है।