लुधियाना, (डॉ. अनिल शर्मा/न्यूज़ DNN नेटवर्क) : भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को प्रत्येक वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महोत्सव मनाया जाता है. श्री कृष्ण की उपासना को समर्पित भादो मास विशेष फलदायी कहा गया है. भद्रा अर्थात कल्याण देने वाला कृष्ण पक्ष स्वयं श्री कृष्णा से संबंधित है. भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को जब रात का आठवां मुहूर्त शुरू हुआ तब अर्धरात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग बन गया. उसी समय पूर्ण पुरुषोत्तम विश्वम्भर प्रभु श्री कृष्ण धरा पर अवतरित हुए.

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इस विशेष उद्देश्य के लिए भगवान ने लिया अवतार
श्रीमद भागवत में उल्लेख आया है कि श्री कृष्ण के जन्म का अर्थ है… अज्ञान के घोर अंधकार में दिव्य प्रकाश एवं प्रमुख उद्देश्य संसार में अधर्म का नाश कर धर्म की रक्षा करना था. प्राकट्य के समय दिवभुज भगवान् के हाथ में मुरली शोभायमान थी. कानों में मकराकृति कुंडल झिलमिला रहे थे. पीताम्बर से सुशोभित श्री विग्रह की कांति नवीन जलधर के समान श्याम थी. वे किशोरवय थे. पिता वासुदेब एवं माता देवकी ने स्तुति के बाद दिव्य रूप को त्याग कर बालक रूप धारण करने की प्राथना की. उसके बाद भगवान् बालरूप में उपस्थित हुए.

उपवास, जागरण एवं भक्ति का पर्व
इस दिन भगवान् का प्रादुर्भाव होने के कारण यह पर्व उपवास, जागरण एवं भक्ति का पर्व मनाया जाता है. जन्माष्टमी के दिन प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान् के लिए व्रत, उपवास एवं भक्ति करने का संकल्प लेना चाहिए. भगवान् के जन्म के उपरांत उनके विग्रह, लड्डू गोपाल, शालिग्राम जी का विधिवत षोडशोपचार पूजन करके भगवान् श्री कृष्ण के चरित्र का गुणगान करना चाहिए. साथ ही श्रीमदभागवतएवं गीता का पाठ, गोपाल सहस्रनाम, द्वादशाक्षरी मंत्र अथवा स्त्रोत्र का पाठ करें.

भागवत पुराण में वर्णन है कि जीव को संसार का आकर्षण खींचता है. उसे उस आकर्षण से हटाकर अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जो तत्व साकार रूप में प्रकट हुआ है उस तत्व का नाम श्री कृष्ण है. श्रीकृष्ण ने अत्यंत गूढ़ और सूक्ष्म तत्व अपनी अठखेलियों और अपने प्रेम और उत्स्साह से आकर्षित कर लिया.

भगवान श्री कृष्ण ने इस तरह डाली सामाजिक न्याय की नींव
‘माखन चोरी की लीला से श्री कृष्ण ने सामाजिक न्याय की नींव डाली. उनका मानना था कि गायों के दूध पर सबसे पहला अधिकार बछड़ों का है. वह उन्हीं के घर में मक्खन चुराते थे जो खानपान पर कंजूसी दिखाते और बेचने के लिए मक्खन इकट्ठा करते थे. इस प्रकार उनकी कई प्रकार की लीलाएं हैं. उनकी लीला इतनी बहुआयामी एवं शिक्षाप्रद थी कि धार्मिक ग्रंथों में इन्हें लीला पुरुषोत्तम भी कहा गया है. ऐसे तत्व ज्ञान के प्रचारक, समता के प्रतीक भगवान् श्री कृष्णा के संदेश आत्मसात करने वाले मनुष्य को महापतित दशा से उठाकर देवताओं के स्थान पर बैठाने की शक्ति रखते हैं.

(भगवान श्री कृष्ण की असीम अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए विशेष पूजन विधि का प्रकाशन हम जल्द ही करेंगे )