हरिद्वार, 12 सितम्बर (हि.स.)। नवरात्र भारतवर्ष में शक्ति के उपासकों के लिए श्रेष्ठ पर्व है। इस दौरान मां के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। वैसे तो एक वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ के महीनों में कुल चार बार नवरात्र आते हैं, लेकिन चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक पड़ने वाले नवरात्र लोकप्रिय हैं। शेष दो नवरात्र को गुप्त नवरात्र भी कहा जाता है।

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बसंत ऋतु में होने के कारण चैत्र नवरात्र को वासंती नवरात्र तो शरद ऋतु में आने वाले आश्विन मास के नवरात्र को शारदीय नवरात्र कहा जाता है। चैत्र और आश्विन नवरात्र में आश्विन नवरात्र को महानवरात्र कहा जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि ये नवरात्र दशहरे से ठीक पहले पड़ते हैं। दशहरे के दिन ही नवरात्र व्रत का परायण होता है। नवरात्र के नौ दिनों में मां के अलग-अलग रूपों की पूजा को शक्ति की पूजा के रूप में भी देखा जाता है।

मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि मां के नौ अलग-अलग रूप हैं। नवरात्र के प्रथम दिन घट स्थापना की जाती है। इसके बाद लगातार नौ दिन मां की पूजा व उपवास किया जाता है। दसवें दिन कन्या पूजन के पश्चात उपवास खोला जाता है।
घट स्थापना का शुभ मुहूर्त

ज्योतिषाचार्य श्रीमहंत त्रिवेणी दासमहाराज के अनुसार, जिन घरों में नवरात्रि पर घट स्थापना होती है, उनके लिए शुभ मुहूर्त 21 सितम्बर की सुबह छह बजकर तीन मिनट से लेकर आठ बजकर 22 मिनट तक का है। इस दौरान घट स्थापना करना अच्छा होगा। किसी भी वक्त कलश स्थापित किया जा सकता है। वैसे नवरात्र के प्रारंभ से ही अच्छा वक्त शुरू हो जाता है, इसलिए अगर जातक शुभ मुहूर्त में घट स्थापना नहीं कर पाता है तो वो पूरे दिन किसी भी वक्त कलश स्थापित कर सकता है। क्योंकि मां दुर्गा कभी भी अपने भक्तों का बुरा नहीं करती हैं। अभिजीत मुर्हूत 11.36 से 12.24 बजे तक है। देवी बोधन 26 सितंबर मंगलवार को होगा। बांग्ला पूजा पद्धति को मानने वाले पंडालों में उसी दिन पट खुल जाएंगे। जबकि 27 सितम्बर सप्तमी तिथि को सुबह 9.40 बजे से देर शाम तक पट खुलने का शुभ मुहूर्त है।