नई दिल्ली, 25 दिसम्बर (हि.स.)। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का सोमवार 25 दिसम्बर को 93वां जन्मदिन है । वह भारत के इतिहास में उन शीर्ष नेताओं में से एक हैं जिन्होंने नेहरू-गांधी परिवार से इतर अपने करिश्माई व्यक्तित्व से न सिर्फ प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे बल्कि कई महत्वपूर्ण योजनाओं की शुरुआत कर भारत को एक नई दिशा दी। बाजपेयी की पहचान एक कुशल और लोकप्रिय राजनेता के साथ ही एक प्रसिद्ध कवि औऱ पत्रकार के रूप में भी है। उन्होंने इन सभी क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। आज सक्रिय राजनीति से वह भले किनारे हैं किंतु उनसे प्रेरणा लेकर हजारों-लाखों राजनैतिक कार्यकर्ता आज भी अनवरत उनकी दिखाई राह पर आगे बढ़ रहे हैं।

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक अध्यापक के घर 25 दिसम्बर, 1924 को कृष्ण बिहारी बाजपेयी व श्रीमती कृष्णा बाजपेयी के घर जन्मे अटल बिहारी बाजपेयी की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर में ही हुई और उसके बाद आगे की पढ़ाई उन्होंने कानपुर में की। कानपुर के डीएवी कालेज में राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के बाद बाजपेयी ने पत्रकारिता को अपना कैरियर चुना और पांचजन्य, वीर अर्जुन समेत कई समाचार पत्रों का संपादन किया ।

अपनी कुशल एवं विशिष्ट भाषण शैली के लिए प्रसिद्ध अटल बिहारी बाजपेयी 1951 में भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं तथा 1968 से 1973 तक उसके अध्यक्ष भी रहे। बाजपेयी ने अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर प्रारंभ किया और उसका बखूबी निर्वाह भी किया। वह केंद्र की राजनीति में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया। 24 घटक दलों की अगुवाई कर उन्होंने अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया । उनकी सरकार द्वारा शुरू की गई स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और राष्ट्रीय राजमार्गों को फोर लेन में तब्दील करने जैसी योजनाओं ने देश में विकास और तरक्की को नई गति दी। पोखरण परमाणु परीक्षण कर उन्होंने देश को परमाणु संपन्न राष्ट्रों की श्रेणी में ला खड़ा किया।

बाजपेयी अपने राजनैतिक जीवन में 9 बार लोकसभा के सदस्य रहे । वह 1962 से 1967 तक और 1986 में भी राज्यसभा के सदस्य रहे । बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने 16 मई, 1996 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली किंतु बहुमत के अभाव में 31 मई, 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। 1998 के लोकसभा चुनावों में राजग गठबंधन के नेता के तौर पर उन्होंने बहुमत हासिल किया और दूसरी बार प्रधानमंत्री बने किंतु यह कार्यकाल भी वह पूरा नहीं कर पाए। इसके बाद 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में राजग को बहुमत मिला और उन्होंने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

बाजपेयी की रचनाएं
मृत्यु या हत्या, अमर बलिदान (लोक सभा में अटल जी के वक्तव्यों का संग्रह), कैदी कविराय की कुण्डलियां, संसद में तीन दशक, अमर आग है, कुछ लेख: कुछ भाषण, सेक्युलर वाद, राजनीति की रपटीली राहें और मेरी इक्यावन कविताएं उनकी प्रमुख रचनाओं में शुमार हैं।